भूमि व मशीनरी बिक्री विवाद के बीच कर्मचारी राज्य बीमा निगम का निषेधात्मक आदेश, 17.38 हेक्टेयर औद्योगिक जमीन कुर्की के शिकंजे में

मोहन जूट मिल मामला फिर विस्फोटक, 10 करोड़ से अधिक की ईएसआईसी वसूली ने हिला दिया बिल्डर्स का सिस्टम, प्रशासन बेनक़ाब…

रायगढ़ । मोहन जूट मिल से जुड़ा विवाद एक बार फिर पूरे जिले में उबाल पर है। जमीन और मशीनरी की बिक्री को लेकर उठे सवाल अभी ठंडे भी नहीं पड़े थे कि कर्मचारी राज्य बीमा निगम रायपुर ने रायगढ़ प्रोजेक्ट्स लिमिटेड, पूर्व में मोहन जूट मिल्स लिमिटेड, के खिलाफ 10 करोड़ रुपये से अधिक की बकाया वसूली का निषेधात्मक आदेश चस्पा कर दिया। इस कार्रवाई ने न केवल औद्योगिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ईएसआईसी द्वारा चस्पा आदेश में स्पष्ट किया गया है कि कंपनी द्वारा वर्षों से कर्मचारियों के बीमा अंशदान और नियोक्ता अंशदान की राशि जमा नहीं की गई, जिसके चलते अब आयकर अधिनियम की दूसरी अनुसूची के नियम 48 के तहत कठोर कदम उठाया गया है। यह आदेश सीधे तौर पर उद्योग की संपत्ति पर कानूनी शिकंजा कसता है और किसी भी प्रकार के लेनदेन पर रोक लगाता है।

अक्टूबर 2025 तक की स्थिति में 10 करोड़ 42 लाख का बकाया

ईएसआईसी रायपुर द्वारा जारी नोटिस के अनुसार रायगढ़ प्रोजेक्ट्स लिमिटेड पर 10 करोड़ 42 लाख रुपये से अधिक की राशि बकाया है, जो अक्टूबर 2025 तक की स्थिति के अनुसार दर्शाई गई है। इसके अतिरिक्त इस राशि पर आगे भी ब्याज देय रहेगा। आदेश में साफ शब्दों में चेतावनी दी गई है कि यदि तय समयसीमा में भुगतान नहीं किया गया तो 17.38 हेक्टेयर की पूरी औद्योगिक भूमि को कुर्क कर बकाया राशि की वसूली की जाएगी। यह जमीन रायगढ़ जिले के बेलदुला क्षेत्र अंतर्गत ग्राम बान्जीपाली में स्थित है और इसमें दर्जनों खसरा नंबर शामिल हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि कार्रवाई प्रतीकात्मक नहीं बल्कि पूर्ण औद्योगिक परिसर पर है।

बिक्री, हस्तांतरण और मुनाफे पर लगाई गई पूरी तरह से रोक

ईएसआईसी के निषेधात्मक आदेश के तहत मोहन जूट मिल की जमीन, भवन और उससे जुड़ी संपत्तियों को बेचने, स्थानांतरित करने, गिरवी रखने या किसी भी प्रकार का लाभ उठाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। हालांकि फिलहाल संपत्ति का भौतिक कब्जा नहीं लिया गया है, लेकिन कानूनी रूप से मालिकाना अधिकारों के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। आदेश की प्रतिलिपि तहसीलदार रायगढ़ और उप पंजीयक भूमि एवं राजस्व रायगढ़ को भी भेजी गई है, ताकि किसी भी प्रकार का पंजीयन या दस्तावेजी लेनदेन रोका जा सके। इससे यह संकेत साफ है कि आने वाले दिनों में मामला और सख्त मोड़ ले सकता है।

इतने वर्षों तक प्रशासनिक चुप्पी क्यों, प्रशासन कटघरे में

इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मशीनरी बाहर निकाली जा रही थी, जमीन की बिक्री और कब्जे की चर्चाएं शहर में खुलेआम चल रही थीं, तब संबंधित विभाग कहां था। क्या यह केवल प्रशासनिक सुस्ती थी या फिर किसी स्तर पर आंखें मूंद ली गई थीं। यह सवाल अब आम नागरिकों से लेकर कानूनी और राजनीतिक गलियारों तक में गूंज रहा है। तहसीलदार रायगढ़ शिव कुमार डनसेना ने इस संबंध में कहा है कि पत्र संभवतः प्राप्त हुआ है और उसे देखने के बाद ही स्थिति स्पष्ट की जा सकेगी। यह बयान अपने आप में प्रशासनिक तैयारी और सतर्कता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

बढ़ गया सियासी और प्रशासनिक तापमान

ईएसआईसी की इस अचानक लेकिन निर्णायक कार्रवाई ने मोहन जूट मिल प्रकरण को एक बार फिर आग में घी डालने का काम किया है। अब यह मामला केवल जमीन या मशीनरी का नहीं रहा, बल्कि कर्मचारियों के अधिकारों, सरकारी राजस्व और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है। आगे की कार्रवाई क्या होगी, यह तो समय बताएगा, लेकिन फिलहाल रायगढ़ में यह मुद्दा फिर से सियासी और प्रशासनिक तापमान बढ़ा चुका है।

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